क्या आपका हेल्थकेयर प्रोडक्ट Assay Tested है?
Before You Take Food Supplements or Nutrition Products, Here’s the Truth You Must Know!
आप जो 1000mg वाला विटामिन C सप्लीमेंट ले रहे हैं, क्या आप शर्त लगा सकते हैं कि उसमें सच में 1000mg ही है?
या कहीं सिर्फ 100mg? या उससे भी बुरा, खतरनाक रूप से 2000mg?
और ये मैं आपको सिर्फ डराने के लिए नहीं पूछ रहा हूँ. यह आपकी सेहत और आपकी मेहनत की कमाई से जुड़ा एक बेहद ज़रूरी सवाल है.
हम सब, जब कोई हेल्थ सप्लीमेंट खरीदते हैं - चाहे वो मल्टीविटामिन हो, प्रोटीन पाउडर हो, या कोई हर्बल दवा - तो हम बोतल पर लिखे लेबल पर आँख बंद करके भरोसा कर लेते हैं.
अगर लिखा है '500 mg Curcumin', तो हम मानकर चलते हैं कि अंदर उतना ही होगा. पर क्या ये भरोसा हमेशा सही साबित होता है?
आज हम हेल्थ सप्लीमेंट इंडस्ट्री की एक ऐसी सच्चाई पर से पर्दा उठाएंगे, जिसे हर ग्राहक को जानना चाहिए. एक ऐसा शब्द जो सुनने में भले ही टेक्निकल लगे, लेकिन असल में आपकी सेहत का सबसे बड़ा गार्ड है - और वो शब्द है 'Assay Testing'.
आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि ये छोटा सा टेस्ट कैसे तय करता है कि आपका सप्लीमेंट असरदार होगा, या सिर्फ उम्मीदों और पैसों की बर्बादी.
तो चलिए, सीधे पॉइंट पर आते हैं. आप अपनी सेहत सुधारने के लिए सप्लीमेंट लेते हैं, राइट?
पर क्या हो अगर मैं कहूँ कि आपकी बोतल के अंदर का सामान और उसके लेबल पर लिखी कहानी, दो अलग-अलग चीज़ें हो सकती हैं?
आज हम इसी धोखे की परत को हटाएंगे और बात करेंगे Assay Testing की - वो साइंटिफिक गारंटी जो आपको नकली, बेअसर और यहाँ तक कि खतरनाक प्रोडक्ट्स से बचा सकती है.
Assay Testing - क्या है?
चलिए, इसे एकदम आसान भाषा में समझते हैं.
सोचिए, आप अपना ब्लड टेस्ट कराने लैब जाते हैं. लैब वाला आपका ब्लड सैंपल लेता है, उसे मशीनों पर टेस्ट करता है, और एक रिपोर्ट देता है. उस रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा होता है कि आपके खून में शुगर कितनी है, कोलेस्ट्रॉल कितना है, यूरिक एसिड कितना है - हर चीज़ की सटीक मात्रा.
आप उस रिपोर्ट पर भरोसा करते हैं, क्योंकि वो एक साइंटिफिक प्रोसेस से आई है.
Assay Testing, बिल्कुल यही काम हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स के लिए करती है.
ये एक लैब टेस्ट है जो नापता है कि किसी प्रोडक्ट के अंदर मौजूद 'एक्टिव इंग्रेडिएंट' - यानी वो असली चीज़ जो असर दिखाने वाली है - ठीक उतनी ही मात्रा में है, जितना कंपनी लेबल पर बता रही है.
जैसे, अगर एक प्रोटीन पाउडर के डब्बे पर लिखा है "हर स्कूप में 24 ग्राम प्रोटीन", तो Assay Testing कन्फर्म करेगी कि उसमें वाकई 24 ग्राम प्रोटीन है, या कम.
अगर किसी टैबलेट पर लिखा है "10mg आयरन", तो ये टेस्ट बताएगा कि उसमें 9.8mg है, 10.2mg है, या मज़ाक की तरह सिर्फ 2mg है.
ये किसी भी प्रोडक्ट के दावे को विज्ञान की कसौटी पर कसने जैसा है. इसके लिए HPLC, GC, और ICP-MS जैसी बहुत एडवांस्ड और सेंसिटिव मशीनों का इस्तेमाल होता है, जो किसी भी मिक्सचर में से हर चीज़ को अलग-अलग करके उसकी एकदम सटीक मात्रा बता सकती हैं.
तो, अगली बार जब आप 'Assay Tested' शब्द सुनें, तो इसे कोई भारी-भरकम साइंस का शब्द मत समझिए. बस ये समझिए कि ये उस प्रोडक्ट का 'ब्लड टेस्ट' है, उसका 'रिपोर्ट कार्ड' है, जो साबित करता है कि जो लेबल पर लिखा है, वही बोतल के अंदर भी है.
Assey Testing क्यों है इतना ज़रूरी? आपकी सेहत और पैसे का सवाल
अब आप शायद सोच रहे होंगे, "ठीक है, मात्रा चेक करना अच्छी बात है, पर इतना ज़रूरी क्यों है? थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे से क्या फर्क पड़ता है?"
फर्क पड़ता है दोस्त, और ये फर्क बहुत बड़ा हो सकता है. इसे चार वजहों से समझते हैं.
पहला - जो लिखा, वही अंदर (ईमानदारी का सबूत)
सबसे पहली और सीधी बात है ईमानदारी की. जब आप किसी प्रोडक्ट के लिए पैसे देते हैं, तो आप उस वादे के लिए पैसे दे रहे हैं जो लेबल पर किया गया है.
अगर कोई ब्रांड कहता है कि उसके हर कैप्सूल में 1000 mg ओमेगा-3 है, तो Assay Testing उस वादे का सबूत है.
ये पक्का करता है कि आप ठगे नहीं जा रहे. अगर टेस्ट में पता चले कि प्रोडक्ट में दावे का सिर्फ 30% या 40% ही एक्टिव इंग्रेडिएंट है, तो इसका सीधा मतलब है कि आप हवा खरीदने के पैसे दे रहे हैं. यह सिर्फ पैसे की बर्बादी नहीं, आपके भरोसे का टूटना भी है.
एक Assay Tested प्रोडक्ट दिखाता है कि ब्रांड अपने ग्राहकों के लिए ईमानदार है.
दूसरा - सेफ्टी सबसे पहले (सुरक्षा)
यह सबसे ज़रूरी पॉइंट है. हेल्थ सप्लीमेंट्स के मामले में 'कम' होना और 'ज़्यादा' होना - दोनों ही खतरनाक हैं.
कई विटामिन्स और मिनरल्स, जैसे कि विटामिन A, D, E, K और आयरन, सेलेनियम, जिंक, अगर ज़रूरत से ज़्यादा लिए जाएं, तो शरीर में ज़हर बना सकते हैं.
एक उदाहरण लेते हैं. मान लीजिए, आप डॉक्टर की सलाह पर आयरन की कमी के लिए सप्लीमेंट ले रहे हैं. लेबल पर लिखा है 15mg आयरन.
लेकिन खराब मैन्युफैक्चरिंग के चलते उस बैच की हर गोली में 50mg आयरन है. लंबे समय तक ये ओवरडोज़ आपके लिवर और दिल को हमेशा के लिए डैमेज कर सकता है.
Assay Testing पक्का करती है कि किसी भी हाल में मात्रा खतरनाक लेवल तक न पहुंचे.
और इसका उल्टा भी उतना ही बुरा है. अगर आपको आयरन की सख्त ज़रूरत है और आप जो सप्लीमेंट ले रहे हैं, उसमें 15mg के दावे के बदले असल में सिर्फ 3mg आयरन है, तो आपकी सेहत कभी सुधरेगी ही नहीं.
आप महीनों सोचते रहेंगे कि सप्लीमेंट काम क्यों नहीं कर रहा, जबकि गलती प्रोडक्ट की है. इससे आपके इलाज में देरी होगी और आपकी तकलीफ बढ़ेगी.
तीसरा - असली असर, सही डोज़ पर (सही फायदा)
हर एक्टिव इंग्रेडिएंट का एक 'थैरेप्यूटिक डोज़' होता है - यानी वो कम से कम मात्रा जो शरीर में असर दिखाने के लिए ज़रूरी है. हम सब जानते हैं कि हल्दी में मौजूद करक्यूमिन सूजन घटाता है, लेकिन उसका असर तभी होगा जब वो एक तय मात्रा में लिया जाए.
अगर रिसर्च कहती है कि असर के लिए आपको दिन में 500mg करक्यूमिन चाहिए, और आपका सप्लीमेंट दावे के बाद भी सिर्फ 100mg दे रहा है, तो आपको वो फायदा कभी नहीं मिलेगा जिसके लिए आपने पैसे खर्च किए.
फिर आप निराश होकर कहेंगे, "अरे यार, ये सब बेकार है, सप्लीमेंट काम ही नहीं करते." जबकि असली विलेन तो वो प्रोडक्ट था जिसने आपको सही डोज़ दिया ही नहीं.
Assay Testing यह पक्का करती है कि प्रोडक्ट में इतनी ताकत हो कि वो अपना काम कर सके. इसीलिए अच्छे डॉक्टर्स और न्यूट्रिशनिस्ट हमेशा उन ब्रांड्स पर भरोसा करते हैं जो अपनी ताकत को वैज्ञानिक रूप से साबित कर सकें.
चौथा - नकली और मिलावटी माल से सुरक्षा
सप्लीमेंट्स का बाज़ार बहुत बड़ा और भीड़-भाड़ वाला है. इसका फायदा उठाकर कई बेईमान कंपनियां नकली, मिलावटी या घटिया क्वालिटी के प्रोडक्ट्स बाज़ार में बेच देती हैं.
क्या पता किसी महंगे हर्बल एक्सट्रेक्ट के नाम पर डिब्बे में सिर्फ सोयाबीन का पाउडर या कोई सस्ता फिलर भरा हो? आप बाहर से देखकर कभी अंदाज़ा नहीं लगा सकते.
Assay Testing, खासकर जब ये किसी बाहर की स्वतंत्र लैब (Third-Party Lab) से कराई जाए, तो ये धोखाधड़ी पकड़ने का सबसे पक्का तरीका है. यह ब्रांड के लिए एक तरह से 'ईमानदारी का सर्टिफिकेट' है, जो कहता है, "हम सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें नहीं कर रहे, हमने अपने प्रोडक्ट को विज्ञान से परखा भी है."
साधारण क्वालिटी चेक और Assay Testing में ज़मीन-आसमान का फर्क
कई ब्रांड्स अपने डिब्बे पर 'Quality Checked' या 'GMP Certified' लिख देते हैं, और हमें लगता है कि बस, काम हो गया. लेकिन यह Assay Testing से बिल्कुल अलग है. इस फर्क को समझना बहुत ज़रूरी है.
बेसिक क्वालिटी चेक:
इसका मतलब है प्रोडक्ट के बाहरी गुण जांचना. जैसे, पाउडर में गांठें तो नहीं हैं, कैप्सूल का रंग-रूप ठीक है या नहीं, कोई अजीब महक तो नहीं आ रही. ये ठीक वैसा है जैसे आप बाज़ार से सेब खरीदते वक्त देखते हैं कि वो कहीं से दबा हुआ या सड़ा हुआ तो नहीं है.
माइक्रोबियल टेस्टिंग:
यह सेफ्टी के लिए है. इसमें जांचा जाता है कि प्रोडक्ट में बैक्टीरिया, फंगस या दूसरे कीटाणु तो नहीं हैं जो आपको बीमार कर दें. ये वैसा ही है जैसे सेब को खाने से पहले अच्छे से धोना.
Assay Testing:
यह इन सबसे एक कदम आगे और सबसे ज़रूरी है. यह जांचता है कि उस सेब के *अंदर* विटामिन और पोषक तत्व कितने हैं. क्या उसमें वो ताकत है जिसके लिए आप उसे खा रहे हैं?
तो, हो सकता है एक प्रोडक्ट बेसिक क्वालिटी और माइक्रोबियल टेस्ट पास कर ले, यानी वो दिखने में ठीक है और खाने के लिए सेफ है. लेकिन अगर उसमें एक्टिव इंग्रेडिएंट ही सही मात्रा में नहीं है, तो वो पूरी तरह बेअसर है. इसलिए Assay Testing सिर्फ क्वालिटी का एक हिस्सा नहीं, बल्कि प्रोडक्ट के असर की वैज्ञानिक गारंटी है.
एक Assay-Tested प्रोडक्ट बनता कैसे है?
तो पर्दे के पीछे ये टेस्टिंग होती कैसे है? प्रोसेस काफी सीधा है.
बैच तैयार होता है:
कंपनी किसी प्रोडक्ट का एक पूरा बैच बनाती है. मान लीजिए, 1 लाख कैप्सूल का एक बैच.
सैंपल लिए जाते हैं:
फिर उस पूरे बैच में से अलग-अलग जगह से रैंडम सैंपल उठाए जाते हैं.
लैब में भेजा जाता है:
इन सैंपल्स को एक स्वतंत्र, मान्यता प्राप्त लैब में भेजा जाता है. अच्छे ब्रांड्स ये टेस्टिंग खुद करने के बजाय थर्ड-पार्टी लैब से कराते हैं, ताकि रिपोर्ट पर कोई सवाल न उठे और पूरी पारदर्शिता रहे.
वैज्ञानिक जांच होती है:
लैब में वैज्ञानिक एडवांस मशीनों से टेस्ट करते हैं. सैंपल को खास केमिकल्स में घोलकर मशीन में डाला जाता है. मशीन हर एक चीज़ को उसकी केमिकल प्रॉपर्टी के हिसाब से अलग करती है और उसकी सटीक मात्रा नापती है.
रिपोर्ट बनती है:
आखिर में, लैब एक डिटेल रिपोर्ट बनाती है, जिसे 'सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस' (CoA) कहते हैं.
इस रिपोर्ट में साफ लिखा होता है कि सैंपल में कौन-सा इंग्रेडिएंट कितनी मात्रा में मिला. जैसे - विटामिन C: दावा 500 mg, टेस्ट में मिला 510 mg. आयरन: दावा 10 mg, टेस्ट में मिला 9.8 mg. ये छोटा-मोटा फर्क चलता है, लेकिन अगर दावा 500 mg का हो और मिले सिर्फ 100 mg, तो वो पूरा बैच फेल माना जाता है.
यह पूरी प्रक्रिया पक्का करती है कि आप तक पहुंचने वाला हर प्रोडक्ट वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरे.
तो अब, सबसे ज़रूरी बात. एक स्मार्ट ग्राहक होने के नाते आप क्या कर सकते हैं?
अगली बार जब कोई हेल्थ सप्लीमेंट खरीदें, तो सिर्फ चमकती पैकेजिंग और बड़े-बड़े वादों में मत खो जाइए. आपको कुछ चीज़ें चेक करनी हैं:
लेबल को जासूस की तरह पढ़ें:
क्या पैकेजिंग पर कहीं "Assay Tested", "Potency Guaranteed" या "Third-Party Lab Tested" जैसे शब्द लिखे हैं? ये शब्द दिखाते हैं कि ब्रांड क्वालिटी को लेकर सीरियस है.
ब्रांड की वेबसाइट खंगालें:
जो ब्रांड ईमानदार होता है, वो अक्सर अपनी वेबसाइट पर ये टेस्ट रिपोर्ट्स या 'सर्टिफिकेट ऑफ एनालिसिस' (CoA) खुद दिखाता है. उन्हें यह बताने में गर्व होता है कि उनके प्रोडक्ट्स वादों पर खरे उतरते हैं.
QR कोड ढूंढें: कुछ नए और पारदर्शी ब्रांड्स अब अपनी पैकेजिंग पर एक QR कोड देते हैं. इसे स्कैन करके आप सीधे अपने प्रोडक्ट के बैच की लैब रिपोर्ट देख सकते हैं. ये ईमानदारी का सबसे ऊंचा लेवल है.
मार्केटिंग और विज्ञान में फर्क समझें:
"बेस्ट फॉर्मूला", "चमत्कारी प्रोडक्ट" जैसी बातें सिर्फ मार्केटिंग का शोर हैं. लेकिन "Standardized to 95% Curcuminoids" या "Assayed for Potency" जैसी भाषा वैज्ञानिक सबूत की तरफ इशारा करती है.
अगर कोई ब्रांड यह जानकारी देने से बच रहा है या छिपा रहा है, तो खुद से एक सवाल ज़रूर पूछिए - क्यों? आखिर वो क्या छिपा रहे हैं?
CONCLUSION
तो इन सब बातों का मतलब क्या है आपके लिए? सार बस इतना है कि आप अपने शरीर में जो भी डाल रहे हैं, उसकी शुद्धता और ताकत का सबूत मांगना आपका हक़ है. हेल्थ सप्लीमेंट कैंडी नहीं हैं; ये असरदार कंपाउंड्स हैं जिनका आपकी सेहत पर सीधा असर होता है.
Assay Testing सिर्फ एक फैंसी शब्द नहीं है, यह आपके और ब्रांड के बीच भरोसे की गारंटी है.
यह सुनिश्चित करता है कि आपको सुरक्षा मिले, आपके पैसे की सही कीमत मिले, और सबसे ज़रूरी, आपको वो हेल्थ फायदे मिलें जिनकी आप उम्मीद कर रहे हैं.
भारत में भी, FSSAI जैसी संस्थाएं अब नियम सख़्त कर रही हैं ताकि कंपनियां जो दावा करें, उसे वैज्ञानिक रूप से साबित भी करें.
तो अगली बार जब आप कोई हेल्थ प्रोडक्ट खरीदें, तो सिर्फ ब्रांड का नाम नहीं, उसका रिपोर्ट कार्ड भी मांगिए.
एक पल रुकिए, और पूछिए - क्या आपका प्रोडक्ट Assay Tested है? क्योंकि आपकी सेहत, दावों पर नहीं, सबूतों पर चलनी चाहिए.


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