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Will Poisonous Sting of Coronavirus Crash Down China? (Hindi)

क्या चीन को ले डूबेगा कोरोना वाइरस का जहरीला डंख


इस समय पूरी दुनिया कोरोना वाइरस से फैली महामारी से सकते में है. चीन से शुरू हुई यह महामारी इस समय विश्व के करीब 25 से 30 देशों तक फैल चुकी है. इसकी चपेट में आने वाले लोगों की तादाद बढ़ती ही जा रही है. इस महामारी का सबसे अधिक नुकसान वहीं हो रहा है, जहां पर इस वाइरस का उगम हुआ था. यह देश है चीन.

हालांकि, इस महामारी से निपटने के लिए चीन की ओर से एवरेस्ट शिखर जैसे ऊंचे-ऊंचे दावे तो भले ही किए जा रहे हों, लेकिन इससे निपटते-निपटते अब चीनी सरकार और प्रशासन के भी हाथ-पांव फूलने लगे है. साथ ही विभिन्न तरह की खबरें (या अफवाहें) आने के चलते चीन के लोगों में डर और संदेह का माहौल बढ़ता जा रहा है.

इसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता जा रहा है. चीन की आर्थिक संपन्नता ही थी, जो अब तक वहां के लोगों को शांत बनाए रखती थी. लेकिन अगर यह चरमरा गई तो चीन का पतन निश्चित है. चीन ने भले ही अब तक कम्युनिस्ट हुकूमशाही और पीपल्स आर्मी के जूतों तले जनता को दबाकर रखा है, लेकिन उसी जनता के भीतर आक्रोश का ज्वालामुखी भी उबल रहा है. अगर कोरोना वाइरस के इस संकट से उस ज्वालामुखी हवा मिल गई तो कोरोना का यह जहरीला डंख पूरे चीन के बिखरने का भी कारण बन सकता है.

चीन एक वैश्विक मिथक

पिछले 70 वर्षों के दौरान दुनिया का एक अहम देश चीन वैश्विक तौर पर एक मिथक बना हुआ है. एक फौलाद के पर्दे के पीछे छिपा चीन है जो विश्व के लोगों के लिए अनकही और अनसूनी कहानी के तौर पर स्थापित है. आज सूचना-प्रौद्योगिकी के चलते दुनिया में सूचना संचार बड़ी क्रांति हुई है.

दुनिया के कई देशों में घटने वाली घटनाओं की सूचना पल भर में सार्वजनिक होकर विश्व के कोने-कोने तक पहुंच जाती है. ऐसी स्थिति में भी चीन आज भी बंद मुठ्ठी की तरह है. उसेक भीतर क्या-क्या छीपा है, काफी कम लोगों को पता है. चीन से आज हर रोज काफी सारी खबरें विश्व भर में फैलती रहती है, जिससे हम उसके संदर्भ में कुछ आंकलन कर पाते है. लेकिन यह आंकलन सटिक होने की संभावना नहीं रहती, क्योंकि वह जानकारी ही सटिक होने आसार कम होते है.

चीन से ज्यादातर खबरें वही आती है, जो वहां की सरकार चाहती है. जाहीर है कि, सरकार ऐसी कोई खबर दुनिया तक पहुंचने देती नहीं होगी, जोकि उसकी छवि को धूमिल कर सकें. इसलिए सरकार की अनुमति से आने वाली खबरें यही बताने का काम करती है कि, चीन में सब चंगा सी.

कोरोना का जहरीला डंख


कई ऐसी बातें भी है जो कभी भी चीन से बाहर जाती ही नहीं. ऐसे में पिछले कुछ दिनों से चीन से कोरोना वाइरस को लेकर खबरें तो आ रही है, लेकिन इसका उचित विश्लेषण करने में विशेषज्ञ भी कामयाब नहीं हो पा रहे है, क्योंकि इस मामले में चीनी सरकार पहले से कई गंभीर बातें छुपाने का प्रयास कर रही है. यही एक कारण है जो दुनिया को चीन के संदर्भ में संदेह बढ़ाने को मजबूत करता है.

कोरोना वाइरस के फैलने की सबसे पहले सूचना देने वाले डाॅक्टर की हाल ही में मौत हो गई है. लेकिन खबरें ऐसी भी है कि, उसके द्वारा दी गई सूचना को प्रशासन की ओर से घोर अनदेखी की गई है, जिससे कोरोना ने आज पूरे विश्व को ही अपनी जानलेवा चपेट में ले लिया है. अगर इस डाॅक्टर की बातों को सुन लिया जाता तो शायद स्थितियां इससे बेहतर होती.

लेकिन इस डाॅक्टर को सुनने की बजाय चीनी सरकार ने उस पर ही कड़े प्रतिबंध लगा दिए. हाल ही में उसकी मौत हो गई. लेकिन यह मौत भी अपने पीछे संदेहों कीचड़ में लिप्त कुछ सवाल छोड़ गए है. जाहीर है इन सवालों का जवाब ना तो चीन सरकार दुनिया देगी और ना ही कोई इन जवाबों को ढूंड पाएगा. यह सवाल हुकूमशाही के घने अंधेरों में लूप्त हो चुके है.

कहा यह जा रहा है कि, चीन में आज कोरोना के चलते 700 से अधिक मौतें हो गई है. लेकिन इन आंकड़ों के पड़ताल की कोई व्यवस्था ना होने के चलते इस पर पूरी तरह से विश्वास रखना अंधविश्वास ही साबित होगा. कुछ सूत्रों के मुताबिक अब तक चीन में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या 30 हजार से अधिक हो चुकी है.

इस बीच एक ऐसी भी खबर आई थी कि, चीन सरकार ने वहां के सुप्रिम कोर्ट में कोरोना से ग्रसित 30 हजार लोगों को मौत के घाट उतारने के लिए परमिशन मांगी गई है. हालांकि, बाद में यह खबर फेक होने की जानकारी सामने आई. लेकिन जब तक चीनी सरकार कोरोना के संदर्भ में कोई सटिक और पारदर्शी जानकारी सामने नहीं लाती तब तक इस तरह के संदेह तो किसी भी वाइरस के संक्रमण से भी नहीं मर सकेंगे.

आधुनिक चीन का इतिहास

वैसे चीन का इतिहास हजारो वर्षों का रहा है. लेकिन आधुनिक काल में हम विचार करें तो माओ त्से तुंङ ने 1949 में चीन में क्रांति के साथ कुओमिन्टांग पर विज हासिल करते हुए सत्ता हासिल की थी. माओ पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे. माओ ने समाजवादी तरीके से देश के विकास का नारा दिया था.

चूंकि, एक हुकूमशाही राज्यव्यवस्था के चलते चीन बाकी देशों की तरह लोकतांत्रिक नहीं हुआ, जिससे वहां पर घटने वाली घटनाएं कभी सार्वजनिक हुई ही नहीं. 1956 में माओ ने देश दे औद्योगिकीकरण का नारा दिया. इसके चलते सारे चीनी लोग पोलाद बनाने के काम में जूट गए थे. किसानों ने खेती करना छोड़ लोहा बनाने लगे थे.

इसका असर यह हुआ कि, चीन में अगले कुछ वर्षों में भारी सूखा पड़ा. लोगों को खाने को अनाज ही नही मिल रहा था. इस भीषण स्थिति में करीब 4 करोड़ लोगों के मरने की आशंका जताई जाती है. हालांकि, यह आंकड़ा इससे भी अधिक का बताया जाता है, लेकिन यह भी एक रहस्य ही बना हुआ है.

इस घटना से कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ चीन में भी काफी उथलपुथल हुआ. इसीके चलते पार्टी में लिऊ शाओ ची तथा डेंग ज्याओ पिंग जैसे नरमपंथी नेता सत्ता में आए और उन्होंने माओ को किनारे कर दिया. इस स्थिति में माओ ने अपने आप को फिर स्थापित करने के लिए एक सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी, जोकि आगे चलकर हजारो लोगों की मौत का कारण बनी.

लेकिन माओ की मृत्यु के बाद फिर एक बार डेंग झ्याओ पिंग सत्ता में आए और उन्होंने 1978 में चीन में आर्थिक सुधारों का चलाया. इसी आर्थिक सुधारों के दौर ने आधुनिक विकसीत चीन नींव रखी. डेंग ने चीनी अर्थव्यवस्था को खुला कर दिया, जिससे चीन में बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी निवेश हुआ. आज चीन विदेशी पूंजी आकर्षिक करने में शायद दुनिया में सबसे पहले नंबर होगा.

खुली अर्थव्यवस्था के चलते पिछले चार दशकों के दौरान चीन ने जमकर आर्थिक प्रगति रफ्तार पकड़ी. इन्फ्रास्ट्रक्चर में काफी कामा हुआ. बड़े-बड़े हाइवे, पूल, बिल्डिंगों और बांधों का निर्माण हुआ.  कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में जबरदस्त क्रांति हुई, जिससे चीन का उत्पादन काफी बढ़ गया. रोजगार भी बढ़ गए. लोगों का जीवनस्तर सुधरा. लेकिन यह सब विकास करते समय चीन की सरकार ने कभी जनता की नहीं सुनी.

चीन सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों को कभी भी मानवी चेहरा नहीं रहा. साथ ही विकास करते समय पर्यावरण के संबंध में कभी भी ध्यान नहीं रखा गया. जिससे चीन विकास की अंधी दौड़ में विनाश के रास्ते पर चल पड़ा. अप्राकृतिक तरीके से होने वाले इस विकास के चलते चीन आज कई सारी समस्याओं से जूझ रहा है. लोगों का जहां जीवनस्तर सुधारने के चलते सरकार के विकास कार्यों के प्रति उनकी सहानुभूति रही, लेकिन स्वतंत्रता मूल मानवी भावना को इस पूरे परिचालन में कहीं दरकिनार कर दिया गया.

सरकार के कई फैसलों से वहां की जनता खुश नहीं रहती. लेकिन फिर भी उन्हें उन फैसलों को मानना ही पड़ता है. इस बात का एक सामाजिक और मानसिक दबाव वहां की जनता काफी मात्रा में झेल रही थी. लेकिन केवल वित्तीय विकास और संपन्नता ही है, जोकि वहां की जनता को अब तक शांत रख रही थी.  किसी भी समस्या का सामन करते समय चीनी सरकार ने केवल समस्या पर ध्यान दिया. उस समस्या को हल करते समय क्या मानवीय त्रासदी हुई इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया. यही कारण है चीनी जनता में सूप्त रूप से एक क्रोध उबल रहा है, जोकि आने वाले समय में ज्वालामुखी के रूप में फट सकता है.

कोरोना बन सकता है ज्वालामुखी

कोरोना वाइरस की शुरुआत होने के साथ ही फिर एक बार जनता के आक्रोश का यह ज्वालामुखी चीन में उबलने लगा है. चीन जिस तरह से इस समस्या से पार पाने की कोशीश कर रहा है, उससे इसमें इजाफा होने के आसार है. क्योंकि इस समस्या से निपटने के लिए चीन अमानवीय तरीके अपना रहा है.

साथ ही यह समस्या बढ़ने से चीन में वित्तीय उथलपुथल दिखाई दे रही है. चीन की अर्थव्यवस्था को कोरोना का संक्रमण हो चुका है. उनके शेयर बाजार के सेन्सेक्स ने गहरा गोता लगाते हुए पिछले 15 वर्षों में सबसे नीचले स्तर पर पहुंच गया है. इससे कई कंपनियों के शेयर गिर गए है.

कई सारी कंपनियों में इस समय उत्पादन बंद कर दिया गया है. वूहान शहर में तो जैसे आपातकाल की स्थिति है. यहां से  लोगों को ना बाहर जाने दिया जा रहा है, वहीं बाहर से लोगों को आने दिया जा रहा है. एक करोड़ आबादी वाला यह शहर इस समय दुनिया का सबसे बड़ा खुला बंदीगृह बन चुका है. इस बात से भी लोगों में खासी नाराजगी दिखाई दे रही है.

टोयोटा, फोक्सवैगन, जनरल इलेक्ट्रिकल्स, होंडा, ह्युंडाई जैसी कंपनियों का कामकाज ठप पड़ा है. ब्रीटेन के ब्राण्ड बेरबेरी ने अपने कई स्टोअर बंद कर दिए है. इस सब का इसर चीनी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. हालांकि, चीनी सरकार इससे निपटने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही  है. लेकिन यह संकट और गहराता चला गया तो यह चीन के पतन का भी कारण बन सकता है.

अगर निकट भविष्य में कोरोना वाइरस का प्रकोप शांत हुआ, तो भी चीनी सरकार और जनता को इस पर गंभीरता से चिंतन करना जरुरी है. विकास को एक मानवी चेहरा दिलाना जरुरी है. चीनी जनता को भी अपनी भौतिकवादी और भोगवादी विलासीता जीवन पर लगाम लगानी जरुरी है. विकास करते समय पर्यावरण की अनदेखी कितनी भारी पड़ सकती है, यह देखने की जरुरत है.

अगर चीन और चीनी जनता इस बात को नहीं समझ पाई तो आने वाले समय में इस तरह की परिस्थितियां फिर उत्पन्न होगी, लेकिन उस समय चीन की दशा और दिशा होगी इस संदर्भ में आज को भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. चीनी प्रशासन जितना जल्दी इस बात को समझें उसके अस्तित्व के लिए उतना आवश्यक आहे. 
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