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Super 30: An inspirational journey begins ...


सुपर 30 :
एक प्रेरणादायी सफर की शुरुआत...


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आनंद कुमार (जन्म 1 जनवरी 1973) एक भारतीय गणितज्ञ हैं, जिन्हें उनके सुपर 30 कार्यक्रम के लिए जाना जाता है, जिसे उन्होंने पटना, बिहार में 2002 में आईआईटी-जेईई के वंचित एवं गरीब छात्रों के लिए शुरू किया था.

उनकी बनायी हुयी ''सुपर 30 बैच'' से आयआयटी प्रवेश परीक्षा के लिए 2018 तक, 480 में से 422 विद्यार्थी पात्र हो चुके हैं. डिस्कवरी चैनल ने भी एक डाक्यूमेंट्री में आनंद सर का काम दिखाया हैं.
उन्ही के जीवनी को 2019 की फिल्म "सुपर 30" में चित्रित किया गया है,


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एक आम जिंदगी जीने के लिए इंसान को रोटी, कपडा और मकान के अलावा अगर किसी चीज की जरुरत होती हैं तो वह हैं शिक्षा. शिक्षा प्राप्त करने के लिए पैसा लगता हैं, ये वहम हमारे दिलों में इस तरह से भर दिया गया जिस से उबरने के लिए आज कई बुद्धिमान बच्चे और शिक्षक संघर्षरत हैं. शिक्षा की इस होड़ में कुछ सफल हो जाते हैं, कुछ असफल !

असफल होना भी एक अपने आप में एक सफलता ही हैं, जो आपको सफल बनने के कई रास्ते खुले करने में मददगार साबित होती हैं. दुनिया में असफल लोगो ने ही इतिहास रचा हैं.

अगर कोई असामान्य काम करना चाहता हैं तो, वह करने की तीव्र चाह उसके दिल में होनी चाहिए जैसे की स्टीव जॉब्स कहते हैं-

"The people who are crazy enough to to think that they change the world,

are the ones who do."


आयआयटी में पढ़ने की चाह किसे नहीं होती. और यह राह तब और मुश्किल होती जब आपके पास सही कोचिंग के लिए पैसा भी ना हो. मगर कुछ लोग होते हैं ऐसे... जो आपके सपनों को किसी जादूगर की तरह पूरे करने में मदद करते हैं.


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जैसे  आनंद कुमार, आज हजारो बच्चों के आनंद सर. ऐसे ही असामान्य लोगो में से एक हैं.

आनंद सर की यह लड़ाई निरंतर कठीण होते जाती हैं, जब उनका पाला एजुकेशन माफिया से पड़ जाता हैं, उनका संघर्ष, अपने काम के प्रति आस्था, दुनिया से अलग कुछ कर दिखने की चाह और ख़ास तौर पर समाज के उस पिछड़े वर्ग के प्रति आस्था जिसकी जिंदगी कौड़ियों के दाम भी नहीं बिकती......

बहुत प्रेरणादायक जीवन स्टोरी देखने मिली, Super 30 फिल्म में. 


देखते समय बस लाजवाब, एक्सीलेंट ऐसे ही कुछ शब्द मुंह से निकल रहे थे, तो कभी कभी ये फिल्म आँखों में आंसू निकलवाती हैं, बस वह आंसू ख़ुशी के होते हैं.

ना संघर्ष ना तकलीफ, तो क्या मजा हैं जीने में 
बड़े बड़े तूफ़ान थम जाते हैं, जब आग लगी हो सीने में
                                                                (अज्ञात शायर) 

आय आय टी एंट्रेंस के लिए महंगी कोचिंग क्लासेस और इंटेलिजेंस दोनों की जरूरत होती है. गुणवत्ता होने के बावजूद भी बहोत से बच्चे पैसों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं, बुद्धिमत्ता के बावजूद, कोचिंग क्लास उन्हें नहीं पढ़ाते. ये एक वास्तव हैं, और जिसको इग्नोर करना शायद हम सीख गए हैं.
मगर आनंदकुमार ने बिहार में स्थिति बदल दी.





कॉलेज में रहते हुए रामानुजन पदक प्राप्त करने वाले आनंद कुमार आर्थिक रूप से बहुत ही सामान्य थे. यहां तक ​​कि अगर उन्हें ऑक्सफोर्ड में प्रवेश मिलता है, मगर पैसे नहीं होने के कारण वह वहां जा नहीं सकते.



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ऐसे में हर समय कवच बने हुए पिता की अचानक मृत्यु उनके जीवन में एक और नया संकट बन कर उभरती हैं. अब तो रोज की जिंदगी जीने के लिए यह युवा पापड़ तक बेचने के लिए मजबूर होता हैं.

मगर हिंदी फिल्मों की तरह ही उनके जीवन में एक ट्विस्ट आता हैं. उस वक़्त 'भला' लगने वाला एक कोचिंग क्लास संचालक जो की आनंद की बुद्धिकौशल्य के बारे में भली भाँती जानता हैं, और उन्हें स्थापित कोचिंग क्लास में पढ़ाने का अवसर मिलता है. जीवन में अब अच्छे दिन आ चुके होते हैं; पैसों की कमी नहीं होती; मगर आनंद अपने भूतकाल के सफर अब तक भूले नहीं थे.

ऐसे में कहानी में ट्विस्ट आता हैं, जब आनंद साइकिल रिक्शा से जा रहे होते हैं, रिक्शा चलाने वाला शख्स महाभारत काल में एकलव्य पर हुए अन्याय की कहानी उन्हें सूना देता हैं. जिसमें एकलव्य से गुरु द्रोणाचार्य जी ने अंगूठा मांग लिया था, क्यों की एकलव्य अर्जुन से बढ़कर तीर चलने की महारथ रखते थे; राजपुत्र अर्जुन की साख बचने में द्रोणाचार्य आखिर कामियाब हो जाते हैं.

राजा का पुत्र राजा, अभिनेता का पुत्र अभिनेता, नेता का पुत्र नेता, अमीर के बच्चों के लिए ही अच्छी शिक्षा...

यह सामाजिक रचना आज के ज़माने में भी हमने अपना ली हैं और ये हमारी व्यवस्था का अटूट अंग हैं, ऐसा भ्रम हम पाल रहे हैं.

मगर आनंद इस व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. शिक्षा से वंचित इन बच्चों के लिए पहल करने का फैसला करते हैं और केवल तीस बच्चों का चयन करके उन्हें आईआईटी कोचिंग देना शुरू करते हैं.


उसके बाद शुरू होता हैं हिम्मत तोड़ देने वाला संघर्ष. एक व्यक्ति पिछले दो दशकों से वंचित वर्गों को शिक्षा क्षेत्र की मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है, यह संघर्ष आज भले ही आईआईटी एंट्रेंस की सीमित परीक्षाओं के संदर्भ में है, मगर एक ऐसे सवाल का जवाब हूँढ़ने की कोशिश करने जैसा हैं, जो प्राचीन काल से चली आ रही बेबसी हैं. कौन बनेगा राजा?

राजा के पुत्र के राजा बनने का अधिकार है, लेकिन क्या वह एक कल्याणकारी राजा बन सकता हैं?

जिनके पास धन है, जिन लोगों के पास आगे बढ़ने के लिए उच्च माहौल हैं, वे इन साधनों का उपयोग अपनी अगली पीढ़ी को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान कर सकते हैं. अमीरों ने खुद के लिए राजमार्ग बनाए और गरीबी के रास्ते पर गड्ढे खोदे.

यह एक संघर्ष है, थोड़ा भ्रमित करने वाला, कभी-कभी व्याकुल और बहुत ही सुखद करनेवाला है. जब आप पाते हैं कि यह कोई कहानी नहीं है, तो यह वास्तव में हुआ, और हो रहा है.

शिक्षा माफियाओं द्वारा उनकी हत्या की कोशिश की जाती हैं, उस वक़्त उनका एक डायलाग अंतर्मन को चीर कर रख देता हैं. अगर मुझे कल कुछ हो जाता हैं, तो कृपया मेरे मरने की खबर न छापें. क्योंकि कई लोग बदलाव लाने के लिए काम कर रहे हैं और मेरी हत्या की खबर से उनका आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए.

मैथमेटिक्स जैसे कठीण लगने वाले विषय को इतना आसान कर बताया गया हैं और फिल्म के अंत में वही मैथमेटिक्स कैसे काम अत हैं ये देखना रोचक सिद्ध होगा. जब फिल्म एक टकराव की स्थिति में आती है, तो आप इसके अंत को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं,



आनंद सर की जीवनी पर बनी ये फिल्म को सही न्याय ऋतिक रोशन ने दिया हैं. उनकी अदाकारी ने आनंद कुमार का जीवन चरित्र जैसे हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप से उभर जाता हैं.

जो लोग अपने जीवन में कुछ करने की मंशा रखते हैं, मगर रास्ते में आने वाले संकटो के सामने अपने हथियार डाल देते हैं, ऐसे लोगो के लिए प्रेरणा बनकर आयी यह फिल्म को निश्चित ही लम्बे अरसे तक याद रखा जाएगा.
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