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Political Conspiracy: Is Sanjeev Bhat a scapegoat?

In his affidavit to the Nanavati Mehta Commission probing the Gujarat riots, Sanjeev Bhatt had said that the then Chief Minister Narendra Modi met senior police officials and directed them not to take any action against Hindu rioters. Due to this incident, Sanjeev Bhatt came into the eyes of the people of BJP-VHIMP.


Political Conspiracy: Is Sanjeev Bhat a scapegoat



राजनीतिक षड्यंत्र:क्या संजीव भट्ट बलि का बकरा है?

संजीव भट्ट ने गुजरात दंगों की जांच करनेवाले नानावटी मेहता कमिशन को दिए अपने एफिडेविट में कहा था कि, तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक बैठक कर उन्हें हिंदू दंगाईयों पर कुछ भी कार्रवाई न करने के निर्देश दिए. इसी घटना के चलते वे भाजपा-विहिंप के लोंगो की आंखों में संजीव भट्ट अंदर तक चूभते चले गए.


भारतीय स्वतंत्रता के बाद के इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी है, जिन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. यह घटनाएं भारत माता को पहुंचे उन जख्मों की तरह है, जिन जख्मों से बीते कई दशकों बात आज भी खून रिस रहा है. इन घटनाओं ने भारतमाता को लहुलुहान कर दिया है.

देश के बटवारे की त्रासदी हो, आपातकाल की स्थिति हो, 1984 में हुए सीखों का कत्लेआम हो, 1992 में बाबरी मशीद के पतन के बाद देशभर में भड़के दंगें हों, या 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में उमजे भीषण दंगे हों. यह सभी घटनाएं कभी भी भुलाई नहीं जा सकती. इन सभी घटनाओं का कवित्व ऐसा ही चलता रहेगा. 

इन सभी की आज यहां पर चर्चा करने की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि कुछ दिन पहले गुजरात के एक आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को एक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई. हालांकि, गुजरात को छोड़ संजीव भट्ट शायद पूरे देश के लिए एक अनजान पहेली हों. लेकिन उनके मामले में आज खुद न्यायपालिका ही सवालों के कटघरे में खड़ी की जा रही है.

ऐसा देश में पहली बार नहीं हुआ कि, देश की न्यायपालिका ने कुछ एक फैसला लिया हों और उसका विरोध ना हुआ हो. हालांकि, न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र के चार स्तंभों में से न्यायपालिका ही एक ऐसा स्तंभ है, जिस पर आज भी देश के लोग आंखें मूंदकर भरोसा कर सकते है.

संजीव भट्ट के मामले में न्यायपालिका पर क्यों सवाल उठाए जा रहे है, इस पर हम इस लेख में चर्चा करेंगे. हम किसी भी स्तर पर न्यायालय के फैसले का विरोध नहीं करते. बल्कि हम न्यायालय का नितांत आदर करते है. लेकिन फिर भी हम संजीव भट्ट के केस के अनसुलझे पहलूओं की पड़ताल करेंगे.

इससे पहले कि, हम संजीव भट्ट पर लगे आरोपों के संदर्भ में चर्चा करें इससे पहले संजीव भट्ट के संदर्भ में कुछ जानकारी लेना जरुरी है. संजीव भट्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा, विहिंप के विरोधी माने जाते है.

2002 में गोधरा ट्रेन कांड के बाद गुजरात में दंगों की आग भड़क उठी, जिसमें सैंकड़ों की तादाद में अल्पसंख्यकों की मौत हुई. इस घटना की गूंज गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में सुनाई दी. इसी को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन गुजरात की मोदी सरकार की बाह भी मरोड़ते हुए उन्हें खरी-खोटी सुनाई थी.





दंगों की इन घटनाओं में कोताही बरतने के आरोपों के चलते मोदी-शाह के दामन पर लगे खून के दाग धुलने में उन्हें सालों तक काफी पापड़ बेलने पड़े थे. मीडिया के समक्ष अपनी बेगुनाही साबित करते-करते नरेंद्र मोदी के हाथ-पांव फुल गए थे. इसी को लेकर संजीव भट्ट की ओर से मोदी पर हमला बोला गया था.

संजीव भट्ट ने कमिशन को दिए अपने एफिडेविट में कहा था कि, तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक बैठक कर उन्हें हिंदू दंगाईयों पर कुछ भी कार्रवाई न करने के निर्देश दिए. इसी घटना के चलते वे भाजपा-विहिंप के लोंगो की आंखों में संजीव अंदर तक चूभते चले गए. 

संजीव भट के समर्थक आज भी उन्हें इसी घटना के चलते जानबुझकर परेशान करने का आरोप मोदी-शाह की जोड़ी पर लगाते है. संजीव के लिए पूरे देश में कार्यक्रम चलाए जा रहे है. सोशल मीडिया पर संजीव को बचाने के लिए मुहिम छेड़ी गई है.

संजीव भट 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी है. हालांकि, संजीव भट्ट गुजरात पुलिस में एक इमानदार पुलिस अधिकारी के तौर पर जाने जाते थे. उनके कई मिशन की काफी सराहना हो रही थी. खुद गुजरात पुलिस ने कई मामलों में बेहतरीन काम करने के चलते उनकी पीठ भी थपथपाई गई थी.

संजीव भट्ट ने 1999 से लेकर 2002 तक गांधी नगर स्थित स्टेट इंटेलिजेन्स ब्युरो में बतौर डिप्टी कमिश्नर के तौर पर कामकाज सम्भाला है. साथ ही उन्होंने एत समय नरेंद्र मोदी की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी सम्भाली थी.

जिस मामले में संजीव भट को दोषी करार देते हुए उन्हें उम्रकैद की कठोर सजा सुनाई गई है, वह मामला 1990 से शुरू होता है. 1990 में संजीव भट जामनगर इलाके में एडिशनल सुपरिटेंडेंट के पद पर कार्यरत थे. राम मंदिर निर्माण आंदोलन अपने उफान पर था. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली थी.

यह सभी लोग जानते है, अडवाणी की यह रथयात्रा देश में जहां-जहां से गुजरी ऐसे कई जगहों पर दंगे और हिंसाचार हुआ. यह रथयात्रा देश के कई लोग खास तौर पर अल्पसंख्यकों को रौंदती हुई जा रही थी. ऐसे मे यह रथयात्रा जामनगर पहुंचने वाली थी. 

इस बीच अडवाणी की यह रथयात्रा गुजरात के जामजोधपूर से गुजरी, जहां पर हिंसाचार का ज्वालामुखी फट पड़ा. इस हिंसाचार को रोकने की जिम्मेदारी संजीव भट पर आन पड़ी. उन्होंने पुलिस की वर्दी पहनते वक्त जो शपथ ली थी, उस शपथ को खरा करने के लिए कार्रवाई का डंडा चलाया. 

इस कार्रवाई में संजीव भट्ट ने करीब 150 दंगाईयों को टाडा के तहत गिरफ्तार कर लिया. यही घटना शायद संजीव भट्ट के लिए गले की हड्डी बन गई. क्योंकि इस कार्रवाई में ज्यादातर हिंदुत्ववादी संगठन के कार्यकर्ता पकड़े गए थे. कुछ दिनों के बाद विश्व हिंदू परिषद का एक कार्यकर्ता प्रभुदास वैष्णानी की मौत हो गई. प्रभुदास को हिरासत में टार्चर कराने का संजीव भट्ट पर इल्जाम लगा. 

इस घटना में प्रभुदास वैष्णानी के भाई ने बताया कि, उनके भाई की मौत पुलिस ने काफी टार्चर किया. इसमें उनके भाई के गुर्दे को चोट लगने के कारण उनकी मृत्यू हुई.

हालांकि, संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि, प्रभुदास वैष्णानी संजीव की हिरासत में था ही नहीं. संजीव ने उन्हें इंटेरोगेट भी नहीं किया. साथ ही प्रभुदास की मौत उन्हें रिहा करने के 18 दिनों के बाद हुई थी. 

जिन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, उन्हें 31 अक्टूबर 1990 को स्थानीय न्यायालय में उपस्थित किया गया. लेकिन उस समय एक भी आरोपी ने उनके साथ मारपीट होने की बात कोर्ट को नहीं बताई थी. 

पुलिस हिरासत में प्रभुदास के मौत की शिकायत उनके भाई अमृतलाल ने पुलिस में दर्ज कराई थी, जोकि खुद एक विश्व हिंदू परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता रहे है. इसलिए संजीव भट के समर्थक इस शिकायत पर ही सवाल खड़े कर रहे है. 

इस सब में खास बात यह कि, जब संजीव भट्ट पर यह आरोप लगे तो वह गुजरात पुलिस की सेवा में कार्यरत थे और गुजरात के तत्कालीन गृह विभाग की ओर से उन पर लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया गया था. लेकिन सरकार की ओर से बाद में यू-टर्न लिया गया.

इस यू-टर्न की एक खास वजह रही. 2011 में संजीव भट्ट ने जस्टीस नानावटी-मेहता आयोग के समक्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे हमला बोला था. उनके इस एफिडेविट से नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा की काफी किरकिरी हुई थी और कांग्रेस को भाजपा पर तीखा प्रहार करने का मौका मिला था.

संजीव भट्ट की समस्याओं से भरा सफर यहीं से शुरू होता है. क्योंकि उनका यह कदम भाजपा को काफी नागंवार गुजरा था. जिस बात को लेकर संजीव भट्ट को गुजरात सरकार ने बचाने का प्रयास किया था, उसी घटना को लेकर अब गुजरात सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई का मोर्चा खोल दिया.


Former supreme court judge Hon. P.B. Sawant on Gujrat Riots





कस्टोडियल मौत के मामले में कुछ दिन पहले संजीव भट समेत छह पुलिस अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. इसके बाद संजीव भट्ट के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग आ गए.

इस घटना को अब कहीं ना कहीं राजनीतिक कोण भी भी जूड़ गया है. क्योंकि भाजपा, विहिंप या मोदी-शाह विरोधक संजीव भट्ट के समर्थन में आ गए है. 

न्यायालय के फैसले के विरोध में अब संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट खुलकर सामने आ गई है और संजीव के साथ अन्याय होने का आरोप लगा रही है. संजीव राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार होने का आरोप श्वेता लगा रही है.

उपरी तौर पर देखा जाए तो संजीव भट्ट मामले में न्यायालयीन प्रक्रिया के तहत न्याय होने दुहाई दी जा रही हो, लेकिन अगर उनकी पत्नी की ओर से दी जाने वाली जानकारी और सुबूतों को भी झुठलाया नहीं जा सकता. इस पूरे मामले में कई सारे सवालों के जवाब अब तक नहीं मिल पाए है. उनका भी जवाब मिलना जरुरी है.


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1 comment :

  1. In the Sanjeev Bhatt case, many issues remain unresolved. You have accurately analyzed it

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