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Autism: Problems and Treatment

Autism is often found in young children. If we see 20 years ago, the information of this disease for the common people there was absolutely no information. Not only this, people had not even heard of the name Autism. But in the last 20 years, the number of autism patients has increased significantly.

Today, in this article, we will learn about the symptoms and treatment of this disease from Dr. Suryakiran Vaghanna of Vaghanna Clinic, Pune.

Autism: Problems and Treatment

According to Dr. Vaghanna, autism is usually seen in children. In this disease, the child remains mentally quite entangled in himself, due to which it is called Autism.

Till now solid reasons for this disease were not revealed. This can be the reason for problems in some parts of your brain. But after deep research, some facts have come out in the context of this disease.
  • Autism finds four times more in boys than girls.
  • It can occur in children of any caste, religious or social, family income, lifestyle or educational level background.
  • Autism can also be genetic.
  • Children born to adult parents are said to be at greater risk of having autism.
  • If a pregnant woman comes in contact with some (brain-related) disease medication or alcohol, her baby is more likely to be autistic.
  • Other conditions such as diabetes to the mother and obesity are included.
  • When a woman is pregnant and has nausea and vomiting problems for nine months, there is a possibility of autism in the children of such women.
  • Apart from this, if the child cries late after childbirth or if the weight of the baby is low at birth, then the chances of children getting autism are very high.
  • Many times it has been revealed that a child is quite normal from 2 to twp and a half years of age. But later they show signs of autism. In such cases, there is a possibility of autism from the side effects of vaccination. More research is needed for diseases like autism.

Signs of Autism

Special symptoms are seen in children with this type of disease. It is important to identify these symptoms and try to overcome this disease. The main symptoms of this disease are obvious in children's body language and facial discomfort. The sound of the child can also unusual, which seems different from common children. Problems can be seen with eyes, their common behavior is also uncomfortable.

Understanding of the language is less visible in such children, and they can start speaking late. Children become very shy due to this disease and they hesitate away from making contact with others. They have trouble understanding what other people are thinking, due to which it is difficult to express themselves.

Just like ordinary children, they avoid to mingle with other children, can't play with them openly and these children keep avoiding them. When they ever need something, such as when they are hungry and thirsty, they go to the person in the house who looks after them and indicates what they need. When he gets what he needs, then that child loses in his world.

Another characteristic of such children is that when we call them three to four times, they don't respond. When we call them by their name, then they go and look at us. They talk to everyone only according to need. They do not have an emotional response. They do not express any injury and no sorrow. They do the same action over and over again.

Such children have a lot of love for things that go round and round. Fan or the wheel of a car, they can be immersed in it for hours. They have a special interest in rotating the wheels of toy trains/cars for hours, getting lost in the game of placing cartons on the carton and swiveling. They are engaged in such works for hours.

Children suffering from this disease are not interested in eating food by own hands. They do not want to spoil their hands in food, so they insist on eating with a spoon. They do not like the changes in their lives in daily life. Whatever things we say, they repeated them frequently.

What is the treatment?

Due to such behavior of children, many times parents feel a lot of trouble. They keep worrying about their children's future. Many times, even on behalf of doctors, parents are told that there is no treatment on this, only keep on doing speech therapy and occupational therapy.

Parents also get frustrated many times after hearing these words of doctors. But the children who have this kind of disease, their parents no longer need to be disappointed. In Ayurveda and Homeopathy, there is a very good treatment for this disease. Due to these treatments, children with autism can improve to a great extent.

Vaghanna Clinic has been providing the best treatment for all the brain-related diseases like cerebral palsy, retardation, Down syndrome, epilepsy, paralysis, muscular dystrophy, Parkinson's, dementia along with autism for the last 25 years.

In Autism, ayurvedic, homeopathy treatment, special dietary method, occupational therapy, hydrotherapy all of these methods improve the patient to a great extent and he can lead a completely healthy life from a mental point of view.

For more information contact-
Dr. Suryakiran Waghanna
Mobile no. 9822092724










ऑटीज्म (स्वमग्नता) : समस्या और समाधान

छोटे बच्चों में प्राय: ऑटीज्म (स्वमग्नता) की बीमारी पायी जाती है. अगर हम देखें तो 20 वर्ष पहले आम जनता को इस बीमारी के संदर्भ अगर हम देखें तो बिलकुल जानकारी नहीं थी. इतना ही नहीं ऑटीज्म (स्वमग्नता) का नाम भी लोगों ने नहीं सुना था. लेकिन पिछले 20 वर्षों में ऑटीज्म के मरिजों की संख्या काफी ज्यादा बढ़ी है.

आज इस आर्टिकल में हम पुणे स्थित वाघण्णा क्लिनिक के  डॉ. सूर्यकिरण वाघण्णा से इस बिमारी के लक्षण एवं उपचारों के बारे में जानेंगे. 


Autism: Problems and Treatment (Hindi)

डॉ. वाघण्णा के अनुसार, ऑटीज्म आम तौर पर बच्चों में दिखाई देती है. इस बीमारी में बच्चे अपने आप में मानसिक रूप से काफी उलझकर रह जाती है, इसीके चलते इसे स्वमग्नता कहा जाता है.

अब तक इस बीमारी के ठोस कारण सामने नहीं आए थे. यह आपके मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में समस्याएं इसका कारण हो सकता हैं. लेकिन काफी अनुसंधान के बाद इस बीमारी के संदर्भ में कुछ तथ्य सामने आए है.
  • लड़कियों की तुलना में लड़कों में ऑटिज्म चार गुना अधिक होता हैं.
  • यह किसी भी जाति, धार्मिक या सामाजिक, पारिवारिक आय, जीवन शैली या शैक्षिक स्तर पृष्ठभूमि के बच्चों में हो सकता है
  • आटिज्म अनुवांशिक भी हो सकता हैं.
  • वयस्क माता-पिता से जन्मे बच्चे को आटिज्म होने का अधिक खतरा बताया जाता हैं. 
  • यदि एक गर्भवती महिला (दिमाग से सम्बंधित) कुछ बिमारी की  दवाइया,अल्कोहोल के संपर्क में आती हैं, तो उसके बच्चे के ऑटिस्टिक होने की संभावना अधिक होती हैं. अन्य स्थिति जैसे मां को मधुमेह और मोटापे जैसी शामिल हैं. 
  • जब कोई महिला गर्भवती होती है और उसे नौं महिनों तक मतली और उलटी की समस्या रहती है, ऐसी महिलाओं के बच्चों में ऑटीज्म होने की संभावना रहती है.
  • इसके अलावा बच्चे के जन्म के बाद अगर वह बच्चा काफी देरी से रोता है या जन्म के समय बच्चे का वजन काफी कम होता है, ऐसे समय में बच्चों को ऑटीज्म होने की संभावना काफी अधिक होती है.
  • कई बार यह बात सामने आई है की, उम्र के 2 से ढाई वर्षों तक बच्चा काफी नॉर्मल होता है. लेकिन बाद में उनमें ऑटीज्म के लक्षण दिखाई पड़ते है. ऐसे केसेस में टीकाकरण के दुष्परिणाम से ऑटीज्म होने की संभावना रहती है. इस विषय पर और भी ज्यादा अनुसंधान की आवश्यकता है.

बीमारी के लक्षण

इस तरह की  बीमारी होने पर बच्चों में खास तरह के लक्षण दिखाई देते है. इन लक्षणों को हमें पहचान कर इस बीमारी को दूर करने के लिए प्रयास करना जरुरी है. इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में बच्चों बॉडी लैंग्वेज एवं चेहरे पर असहजता स्पष्ट नजर आती हैं. आवाज भी असामान्य होती हैं जोकि आम बच्चों से अलग लगती हैं. आँखों से दिखने में प्रॉब्लम हो सकती हैं, उनका आम व्यवहार भी असहज होते हैं.

ऐसे बच्चों में भाषा की समझ कम नजर आती हैं तथा ऐसे बच्चे देरी से बोलने लगते हैं. इस बीमारी के चलते बच्चे काफी हद तक शर्मिले बन जाते है तथा वे दूसरों से अपना संपर्क बनाने से कतराते है. उन्हें यह समझने में परेशानी होती है कि दूसरे लोग क्या सोच रहे जिसकी वजह खुद को अभिव्यक्त करना कठिन होता है.

आम बच्चों की तरह बाकी बच्चों से घुलना-मिलना, उनके साथ खुलकर खेलना इनसे यह बच्चे बचते रहते है. जब उन्हें कभी किसी चीज की जरुरत होती है, जैसे उन्हें भूख-प्यास लगने पर वे घर में जो व्यक्ति उनकी परवरीश करता है, उसके पास जाकर उसे जो चीज चाहिए होती है, उसकी ओर इशारा करता है. उसे जरुरत की चीज मिलने पर फिर वह बच्चा अपनी दुनिया में खो जाता है.

ऐसे बच्चों का एक और खास लक्षण होता है कि, वह एक बार आवाज देने पर प्रतिसाद नहीं देते. जब हम उन्हें तीन से चार बार आवाज लगाते है, उनके नाम से पुकारते है तब जाकर वे हमारी ओर मूड़कर देखते है. वे हर किसी से केवल जरुरत के हिसाब से ही बातचित करते है. उनमें भावनिक प्रतिसाद नहीं होता. उन्हें कोई चोट लगने पर तथा कोई गम होने पर व्यक्त नहीं करते. वे कई बार एक ही क्रिया को बार-बार करते है.

गोल-गोल घुमने वाली चीजों से ऐसे बच्चों को काफी लगाव होता है. जैसे पंखा, किसी गाड़ी का पहिया इनमें वे घंटों तक डूबे रहते है. खिलौनों के गाड़ियों के पहियों को घंटों तक घुमाते रहना, डिब्बों पर डिब्बों को रखने के खेल में खो जाना, कुंदा-फांदी करने में इन्हें विशेष रुची रहती है. ऐसे कामों में वे घंटों तक लगे रहते है.

इस बीमारी से ग्रसित बच्चे हाथ से खाना खाने से कतराते है. वे खाने में अपने हाथ खराब नहीं करना चाहते, इसलिए वे चम्मच से खाने पर ज्यादा जोर देते है. दैनंदिन जीवन में इनके जीवन में होने वाले बदलाव इन्हें रास नहीं आते. हम जो भी बाते बोलते है, वे उन्हें बार-बार रिपिट करते है.

क्या है इलाज?

बच्चों के इस तरह के बर्ताव के चलते कई बार माता-पिता काफी परेशानी महसूस करते है. उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता बार-बार सताती रहती है. कई बार तो डॉक्टरों की ओर से भी अभिभावकों को बताया जाता है कि, इस पर अब कोई इलाज नहीं है, केवल स्पीच थेरेपी एवं ऑक्युपेशनल थेरेपी करते रहिए.

डॉक्टरों की यह बाते सुनकर माता-पिता भी कई बार निराश हो जाते है. लेकिन इस तरह की बीमारी जीन बच्चों को है, उनके माता-पिता को अब निराश होने की आवश्यकता नहीं है. आयुर्वेद होमियोपैथी में इस बीमारी पर काफी अच्छा इलाज मौजूद है. इन इलाज के चलते ऑटीज्म से ग्रस्त बच्चों में काफी हद तक सुधार हो सकता है.

वाघण्णा क्लिनिक में पिछले 25 वर्षों से ऑटीज्म के साथ-साथ सेरेब्रल पाल्सी, मंदबुद्धि, डाऊन सिंड्रोम, मिरगी, लकवा, मस्क्युलर डिस्ट्रोफी, पार्किनसन, डिमेन्शिया जैसी मस्तिष्क से संबंधित सभी बीमारियों पर यहां बेहतरीन इलाज किया जाता है. ऑटीज्म में आयुर्वेदिक, होमियोपैथी इलाज, खास तरीके की आहार पद्धति, ऑक्युपेशनल थेरेपी, स्वीमिंग इस सभी तरीकों से इलाज किया गया तो मरीज में काफी हद तक सुधार होता है और वह एक मानसिक दृष्टि से पूरी तरह से स्वस्थ जीवन जी सकता है.

अधिक जानकारी संपर्क करें

डॉ. सूर्यकिरण वाघण्णा

मो. 9822092724

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